अल-मुस्तफ़्ती: मुहम्मद तबरेज़ आलम देहलवी
जवाब अगर किसी ने नमाज़ में नियत नहीं की तो उसकी नमाज़ नहीं होगी क्योंकि सरकारे दो आलम ﷺ ने फ़रमाया:> इन्नमल अ'मालु बिन्नियाति व लिकुल्लिम्रिइन् मा नवा
तर्जुमा: अमल का दारोमदार नियतों पर है और हर शख्स के लिए वही है जिसकी उसने नियत की (सहीह बुख़ारी, किताब बद्उल-वह्य)
और सदरुश्शरीअह बद्रुत्तरीक़ह अल्लामा अमजद अली रहमतुल्लाहि अलैह फ़रमाते हैं:
अगर शुरू करने के बाद नियत पाई गई तो उसका एतिबार नहीं यहाँ तक कि अगर तकबीरे तहरीमा में 'अल्लाह' कहने के बाद 'अकबर' कहने से पहले नियत की, तब भी नमाज़ न होगी (बहारे शरीअत, जिल्द 1, हिस्सा 3, सफ़ा 493)
नीज़ फ़र्ज़ नमाज़ों में फ़र्ज़ होने की नियत करना भी ज़रूरी है। सिर्फ़ नमाज़ की नियत काफ़ी नहीं।
जैसा कि सदरुश्शरीअह रहमतुल्लाहि अलैह फ़रमाते हैं
फ़र्ज़ नमाज़ में फ़र्ज़ की नियत भी ज़रूरी है मुतलक़ नमाज़ या नफ़्ल वग़ैरह की नियत काफ़ी नहीं अगर कोई पाँचों वक़्त की नमाज़ पढ़ता हो मगर उनकी फ़र्ज़ियत को जानता ही न हो, तो उसकी नमाज़ न होगी और उस पर उन तमाम नमाज़ों की क़ज़ा फ़र्ज़ होगी। हाँ, अगर वह इमाम के पीछे हो और यह नियत करे कि इमाम जो नमाज़ पढ़ रहा है वही मैं भी पढ़ता हूँ, तो नमाज़ हो जाएगी (बहारे शरीअत, जिल्द 1, हिस्सा 3, सफ़ा 493)
हाँ, नियत में ज़बान से कहना ज़रूरी नहीं। ज़बान से कहना मुस्तहब है, क्योंकि नियत दिल के पक्के इरादे का नाम है
जैसा कि बहारे शरीअत में है: नियत दिल के पक्के इरादे को कहते हैं। महज़ जान लेना नियत नहीं, जब तक इरादा न हो। नियत में ज़बान का एतिबार नहीं। यानी अगर दिल में ज़ुहर की नियत की और ज़बान से अस्र निकल गया, तो ज़ुहर की नमाज़ हो जाएगी (बहारे शरीअत, जिल्द 1, हिस्सा 3, सफ़ा 492)
लिहाज़ा, अगर व्यक्ति ने ज़बान से नियत के अल्फ़ाज़ न कहे हों, मगर दिल में पक्का इरादा मौजूद था, तो नमाज़ हो जाएगी, और अगर दिल में भी नियत नहीं थी तो नमाज़ नहीं होगी
वल्लाहु व रसूलुहू अअलमु बिस्सवाब
अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद साजिद चिश्ती शाहजहाँपुरी ख़ादिम मदरसा दारुल अरक़म मुहम्मदिया मीरगंज बरेली शरीफ़
