अर्फ़ा क्या है और उसकी शरई हैसियत क्या है ?


सवाल शबे-बरात से पहले मरहूम के लिए जो “अरफ़ा (अर्फ़ा नहीं)” के नाम से ईसाल-ए-सवाब किया जाता है उसकी शरई हैसियत क्या है? हवाले के साथ जवाब इनायत फरमाएँ।

साइल मोहम्मद शाकिर रजा़ बिदंकी जिला फतेहपुर उत्तर प्रदेश 

अल-जवाब बिऔनिल-मलिकिल-वहाब 

अरफ़ा क्या है ? आम तौर पर हिंदुस्तान व कुछ इलाक़ों में शबे-बरात से एक दिन पहले मरहूमीन के लिए जो फ़ातिहा, दुआ और ईसाल-ए-सवाब किया जाता है, उसे लोगों ने “अरफ़ा” का नाम दे रखा है। यह नाम और यह खास तारीख़ शरीअत में साबित नहीं है।

मरहूम के लिए ईसाल-ए-सवाब (दुआ, क़ुरआन-ख़्वानी, सदक़ा) करना अपने आप में जायज़ और मुस्तहब अमल है, लेकिन उसे किसी खास दिन या तारीख़ के साथ ज़रूरी समझ लेना या यह समझना कि “अरफ़ा” ही में करना सुन्नत या वाजिब है — इसकी शरीअत में कोई असल नहीं।

अगर कोई शख़्स:सिर्फ़ ईसाल-ए-सवाब की नियत से बिना उसे दीन का लाज़िमी हिस्सा समझे और बिना किसी गलत अक़ीदे के किसी भी दिन (शबे-बरात से पहले या बाद) दुआ व फ़ातिहा करता है, तो यह जायज़ है।

लेकिन अगर:“अरफ़ा” को खास रस्म समझा जाएया यह माना जाए कि इसी दिन करने से ही सवाब मिलता है या न करने वाले को गुनहगार समझा जाए तो यह तरीका बिदअत (नया रस्मी अमल) के दायरे में आएगा।

हदीस शरीफ़ मे है कि आदमी के मरने के बाद भी उसे दुआ और सदक़ा का फायदा पहुँचता है।

📘 सहीह मुस्लिम

ख़ुलासा: मरहूम के लिए ईसाल-ए-सवाब हर दिन जायज़ है।“अरफ़ा” के नाम से शबे-बरात से पहले खास दिन तय करना शरीअत से साबित नहीं।बिना गलत अक़ीदे के किया जाए तो गुनाह नहीं लेकिन उसे दीन या ज़रूरी रस्म समझना दुरुस्त नहीं।

वल्लाहो आलमु बिस्सवाब 

कत्बा नाचीज़ मोहम्मद शफीक़ रजा़ रज़वी खतीब व इमाम सुन्नी मस्जिद हजरत मन्सूर शाह रहमातुल्ला अलैहि बस स्टैंड किशनपुर जिला फतेहपुर उत्तर प्रदेश 

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