सवाल:
आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान फ़ाज़िले बरेलवी रहमतुल्लाह अलैह को "मौलायी" कहना कैसा है?
जवाब
आला हज़रत इमामे अहले सुन्नत, मुजद्दिदे दीन व मिल्लत फ़ाज़िले बरेलवी रहमतुल्लाह अलैह को "मौलायी" कहना दुरुस्त नहीं है।
वजह यह है कि "मौलायी" लफ़्ज़ ख़ास तौर पर शिया फ़िरक़े में उनके ख़ास अक़ीदे की वजह से इस्तेमाल होता है। शिया लोग इस शब्द का इस्तेमाल हज़रत अली करमल्लाहु वज्हहु को "मौला" मानने के अपने ख़ास मतलब में करते हैं। अगर अहले सुन्नत इसको अपनाएँ तो आम लोगों में शुब्हा और ग़लतफ़हमी पैदा होगी, जो नाजायज़ है।
अहले सुन्नत व जमाअत में इमाम अहमद रज़ा ख़ान रहमतुल्लाह अलैह के लिये वोही अलक़ाब मंसूब हैं जो हमारे अक़ाबिर उलमा ने दिये, जैसे:
आला हज़रत
इमामे अहले सुन्नत
मुजद्दिदे दीन व मिल्लत
फ़ाज़िले बरेलवी
इसलिए आला हज़रत को "मौलायी" कहना नाजायज़ व नामुनासिब है और इससे परहेज़ ज़रूरी है।
📚 हवाले:
1. इमाम अहमद रज़ा ख़ान रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:
"ऐसा कलिमा या लक़ब अपनाना जो अहले बातिल के साथ मख़सूस हो और अहले सुन्नत में उससे शुब्हा पैदा हो, ममनूअ और नाजायज़ है।"
(फ़तावा-ए-रज़विया, जिल्द 22, सफा नः . 239, रज़ा फ़ाउंडेशन लाहौर)
2. इमाम नववी शाफ़ई रहमतुल्लाह अलैह ने फरमाया:
"अहले बिदअत की मुशाबहत इख़्तियार करना ममनूअ है, चाहे अल्फ़ाज़ में हो या अफ़आल में।"
(शरह सहीह मुस्लिम लिन्नववी, जिल्द 01, सफा नः. 164)
3. आला हज़रत ने एक मक़ाम पर लिखा:
जो अल्फ़ाज़ किसी मज़हबे बातिल के साथ मख़सूस हों, उनका इस्तेमाल करने से परहेज़ लाज़िम है, ताकि अहले सुन्नत की पहचान बाक़ी रहे
(फ़तावा-ए-रज़विया, जिल्द 06, सफा नः. 259)
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वल्लाहु तआला आलम बिस्सवाब
कत्बा नाचीज़ मोहम्मद शफीक़ रजा़ रज़वी खतीब व इमाम सुन्नी मस्जिद हजरत मन्सूर शाह रहमातुल्ला अलैहि बस स्टैंड किशनपुर जिला फतेहपुर उत्तर प्रदेश