अहम ऐलान
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ISLAMI MALUMAT

मरकज़-ए-तहक़ीक़ व इफ़्ता
शरई फ़तवा दस्तावेज़

सवाल: जिन्नात से मुस्तक़बिल की बाते मालूम करना ?

तारीख़: शुक्रवार, जनवरी 09, 2026

 

सवाल क्या फ़रमाते हैं उलमा-ए-कराम व मुफ़्तियान-ए-इज़ाम इस मसअले के बारे में कि जिन मर्द और औरत पर जिन्नात की हाज़िरी आती है उनसे मुस्तक़बिल ) की बातें पूछना—जैसे:बच्चा कब ठीक होगा ? मैं मुक़दमा जीतूँगा या नहीं?इम्तिहान में कामयाबी पाऊँगा या नहीं? वग़ैरह-वग़ैरह—इस तरह के सवाल करना कैसा है?बराए मेहरबानी इसका जवाब देकर शुक्रिये का मौक़ा इनायत फ़रमाएँ, बड़ी मेहरबानी होगी।

अल-मुस्तफ्ती: दिलशाद अहमद, सिद्धार्थ नगर (यू.पी.)

जवाब जिन्नात से मुस्तक़बिल की बातें पूछना हराम और जहन्नम में ले जाने वाला काम है।

जैसा कि सरकार आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ाँ रहमतुल्लाहि अलैह फ़रमाते हैं:

हाज़िरात करके मुवक्कल जिन्नों से (आने वाली बातें) पूछते हैं—फलाँ मुक़दमे में क्या होगा? फलाँ काम का अंजाम क्या होगा?—यह हराम है।

जिन्न ग़ैब से निरे (पूरी तरह) जाहिल हैं। उनसे आने वाली बात पूछना अक़्लन हिमाक़त और शरअन हराम है, और अगर उनकी ग़ैब-दानी का एत़िक़ाद हो (यानी यह मानना कि जिन्न को इल्म-ए-ग़ैब है) तो यह कुफ़्र है

(फ़तावा अफ़रीक़ा, सफ़्हा 178)

इससे मालूम हुआ कि जिन्नात से भविष्य की बातें पूछना—जैसे बच्चा कब ठीक होगा, मैं मुक़दमा जीतूँगा या नहीं, मैं इम्तिहान में कामयाबी पाऊँगा या नहीं—वग़ैरह, नाजायज़ व हराम है।

जो लोग ऐसा करते हैं, उन पर लाज़िम है कि सच्चे दिल से तौबा करें और आइंदा ऐसा न करने का पुख़्ता इरादा करें।

वल्लाहु व रसूलुहू आलम बिस्सवाब

कतबा:अल-अब्द अल-ख़ाक़सार नाचीज़ मुहम्मद शफ़ीक़ रज़ा रज़वी ख़तीब व इमाम, सुन्नी मस्जिद हज़रत मंसूर शाह रहमतुल्लाह अलैहि बस स्टॉप, कशनपुर (हिन्द) 

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