क्या जिस से ज़ाती रंजिश हो उसके पीछे नमाज़ न होगी ?

 


क्या जिस से ज़ाती रंजिश हो उसके पीछे नमाज़ न होगी ?

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अक्सर ऐसा होता है के इमाम और मुक्तदि के दरमियान कोई दुनियावि इख़्तिलाफ़ हो जाता है जैसे आज कल के सियासी सामाजिक खानदानों और बिरादरियों के इख़्तिलाफ़ात और झगड़े, तो इन वुजुहात पर लोग उस इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ना छोड़ देते हैं और कहते हैं कि जिससे दिल न मिला हो उस के पीछे नमाज़ नहीं होगी। यह उनकी ग़लतफ़हमी है, और वह लोग धोखे में हैं। सही बात यह है कि जो इमाम शराइते इमाम का जामेअ है, बद मज़हब और फ़ासिक़-ए- मोअलिन नहीं है, तो उसके पीछे नमाज़ दुरुस्त है चाहे उससे आप का दुनियावि झगड़ा ही क्यों ना चलता हो। बातचीत दुआ और सलाम सब बंद हो फिर भी आप उसके पीछे नमाज़ पढ़ सकते हैं नमाज़ की दुरुस्तगी के लिए ज़रूरी नहीं है कि दुनियावि एतबार से मुक्तदी का दिल इमाम से मिला हुआ हो। हां 3 दिन से ज़्यादा एक मुसलमान के लिए दूसरे मुसलमान से बुराई रखना और मेलजोल ना करना अज़रुए शराअ (शरीअत के एतिबार से) ना पसंदीदा है हदीस मै है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया मुसलमान के लिए हलाल नहीं कि अपने भाई को 3 दिन से ज्यादा छोड़ रखे, जब उससे मुलाक़ात हो तो 3 मर्तबा सलाम कर ले अगर उसने जवाब नहीं दिया तो उसका गुनाह भी उसी के ज़िम्मे है

📚 (अबूदाऊद, किताबुल अदब, जिल्द 02 सफ़्हा 673)

लेकिन उसका नमाज़ और इमामत से कोई ताअल्लुक़ नहीं रंजिश और बुराई में भी इमाम के पीछे नमाज़ हो जाएगी और जो लोग ज़ाति रंजिशों की बिना पर अपने नफ़्स और ज़ात की ख़ातिर इमामों के पीछे नमाज़ पढ़ना छोड़ देते हैं यह खुदा के घरों को वीरान करने वाले और दीन ए इस्लाम को नुकसान पहुंचाने वाले हैं। इन्हें खुदाए तआला से डरना चाहिए, मरने के बाद की फिक्र करना चाहिए, क़ब्र की एक-एक घड़ी और कयामत का एक-एक लम्हा बहुत भारी पड़ेगा। आला हज़रत इमामे अहले सुन्नत फ़रमाते हैं जो लोग नफ़्सानियत इमाम के पीछे नमाज़ ना पड़े और जमाअत होती रहे और शामिल ना हो वह सख्त गुनहगार हैं

📚 (फ़तावा रिज़विया, जिल्द 03 सफ़्हा 221)

📚 (ग़लत फेहमियां और उनकी इस्लाह, सफ़्हा न: 40,41)


✍🏻 अज़ क़लम 🌹 खाकसार ना चीज़ मोहम्मद शफीक़ रज़ा रिज़वी खतीब व इमाम (सुन्नी मस्जिद हज़रत मनसूर शाह रहमतुल्लाह अलैह बस स्टॉप किशनपुर अल हिंद)

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