सवाल❓
[क्या फरमाते हैं उलमा-ए-किराम व मुफ्तियाने-इकराम इस मसले के बारे में कि एक औरत का निकाह हो चुका है और निकाह से पहले वह नौकरी करती थी। निकाह के बाद भी वह अपनी नौकरी जारी रखना चाहती है, लेकिन उसका शौहर उसे नौकरी करने से मना करता है। बीवी का कहना है कि वह पर्दे का एहतिमाम करती है, नमाज़ की पाबंद है और नौकरी से मिलने वाली तनख्वाह भी अपनी जरूरतों और वालिदैन की मदद के लिए इस्तेमाल करती है। दूसरी तरफ शौहर का कहना है कि निकाह के बाद बीवी को मेरी इजाज़त के बगैर नौकरी करने का हक नहीं और मैं चाहता हूं कि वह घर में रहे
सवाल यह है कि क्या शौहर शरीअत की रोशनी में अपनी बीवी को नौकरी करने से रोक सकता है? अगर बीवी शौहर की इजाज़त के बगैर नौकरी करती रहे तो उसका क्या हुक्म होगा? और अगर शौहर बीवी का नफ़क़ा अदा नहीं करता तो क्या ऐसी सूरत में बीवी अपने खर्च के लिए नौकरी कर सकती है? बीवी की कमाई पर शौहर का कोई हक है या नहीं? कृपया कुरआन व हदीस और फिक़्ह-ए-हनफ़ी की रोशनी में तफ्सील से जवाब इनायत फरमाएं]
🙋♂️ साईल :
[मोहम्मद वारिस अन्सारी मुरादाबाद उत्तर प्रदेश]
🟢 जवाब
[शरीअत-ए-मुतहरा ने निकाह के बाद शौहर और बीवी दोनों के हुकूक और ज़िम्मेदारियां बयान फरमाई हैं। शौहर पर बीवी का नफ़क़ा और जरूरी खर्च अदा करना लाज़िम है और बीवी पर शौहर के जायज़ हुकूक की पाबंदी करना जरूरी है
इसलिए नौकरी के मसले को केवल इस नजर से नहीं देखा जा सकता कि “औरत को नौकरी करने की इजाज़त है या नहीं”, बल्कि यह देखा जाएगा कि नौकरी की जरूरत क्या है, काम की जगह कैसी है, उसमें कौन-कौन से शरई उमूर पाए जाते हैं, शौहर की क्या स्थिति है और क्या निकाह के समय नौकरी जारी रखने की कोई शर्त रखी गई थी...]
[औरत के नफ़क़े की जिम्मेदारी किस पर है?]
[सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि निकाह के बाद बीवी के जरूरी खर्च की जिम्मेदारी असलन शौहर पर होती है। अगर शौहर अपनी बीवी का नफ़क़ा अदा करने पर क़ादिर है और वह शरीअत के मुताबिक उसका जरूरी खर्च पूरा कर रहा है, तो बीवी के लिए सिर्फ कमाई करने के मकसद से ऐसी नौकरी करना जिसमें शौहर की इजाज़त न हो दुरुस्त नहीं]
[अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है]
[وَعَلَى الْمَوْلُودِ لَهُ رِزْقُهُنَّ وَكِسْوَتُهُنَّ بِالْمَعْرُوفِ]
और बच्चे के बाप पर दस्तूर के मुताबिक उनका खाना और कपड़ा देना लाज़िम है
📚 हवाला (Reference) :
[अल कुरआन सूरह अल-बक़रह, 2:233]
[इससे मालूम हुआ कि बीवी की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना शौहर की जिम्मेदारी है
क्या शौहर बीवी को नौकरी से रोक सकता है?
फिक़्ह-ए-हनफ़ी के मुताबिक अगर बीवी का बाहर जाकर नौकरी करना शौहर के हुकूक में कमी पैदा करता हो या उसे घर से बाहर निकलना पड़ता हो, तो शौहर को उसे रोकने का हक हासिल हो सकता है]
[इमाम कासानी रहमतुल्लाहि अलैह ने बदाएउस-सनाए में निकाह के असरात और शौहर के हुकूक के सिलसिले में बीवी के घर से बाहर निकलने के मसले पर तफ्सील बयान की है]
इसी बुनियाद पर हनफ़ी फुक़हा ने ऐसी नौकरी से रोकने का हक बयान किया है जिससे शौहर के हुकूक प्रभावित हों बाज़ हनफ़ी उलमा ने यह भी तफ्सील की है कि अगर काम ऐसा हो जो शौहर के हुकूक को नुकसान न पहुंचाए और घर से बाहर निकलने की जरूरत भी न हो, जैसे घर से कोई जायज़ काम या ऑनलाइन कारोबार, तो मामला अलग हो सकता है इसलिए हर किस्म की नौकरी को एक ही हुक्म में रखना सही नहीं
[अगर नौकरी में पर्दे का एहतिमाम हो तो?]
अगर कोई औरत ऐसी जगह काम करती है जहां गैर-महरम मर्दों से नाजायज़ इख़्तिलात हो, बेपर्दगी हो, तन्हाई की सूरतें पैदा हों या ऐसा कोई दूसरा काम हो जो शरीअत के खिलाफ हो, तो सिर्फ यह कह देना कि “मैं नौकरी करती हूं काफी नहीं काम का खुद जायज़ होना और नौकरी करने का तरीका भी शरीअत के मुताबिक होना जरूरी है अगर नौकरी ऐसी हो जिसमें शरीअत की पाबंदी करना मुश्किल हो और उसमें नाजायज़ काम शामिल हो जाएं तो ऐसी नौकरी से बचना जरूरी होगा अगर बीवी निकाह से पहले से नौकरी करती थी तो? यह एक अहम सूरत है अगर निकाह से पहले बीवी नौकरी करती थी और निकाह के समय शौहर को मालूम था कि वह नौकरी करती है तथा दोनों के बीच यह तय हुआ था कि वह निकाह के बाद भी अपनी नौकरी जारी रखेगी, तो इस शर्त का एहतिमाम किया जाएगा और मसला साधारण नौकरी वाली सूरत से अलग हो सकता है इसलिए निकाह के समय तय की गई शर्तों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए
[अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है]
[يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَوْفُوا بِالْعُقُودِ]
ऐ ईमान वालो! अहद और मुआहिदों को पूरा करो
📚 हवाला (Reference) :
[अल कुरआन सूरह अल-माइदा, 5:1]
इसलिए अगर निकाह के समय कोई जायज़ शर्त बाकायदा तय हुई हो तो उसके असरात का लिहाज़ किया जाएगा।
[क्या बीवी की तनख्वाह पर शौहर का हक है?]
यह भी बहुत अहम सवाल है अगर बीवी ने शरीअत के मुताबिक काम करके कमाई की है तो उसकी कमाई असलन उसी की मिल्कियत है। शौहर को उसकी तनख्वाह पर जबरन कब्जा करने का हक नहीं एक हनफ़ी फतवे में साफ तौर पर बयान किया गया है कि अगर बीवी कमाई करती है तो उसकी कमाई उसकी अपनी मिल्कियत है और वह शरीअत के दायरे में अपनी कमाई को खर्च कर सकती है इसलिए शौहर यह नहीं कह सकता कि “तुम मेरी बीवी हो, इसलिए तुम्हारी पूरी तनख्वाह मेरी है हां अगर दोनों आपसी रज़ामंदी से घर के खर्च में बीवी की कमाई लगाने पर इत्तिफाक करें तो यह अलग बात है लेकिन सिर्फ शौहर होने की वजह से बीवी की कमाई उसकी मिल्कियत नहीं बन जाती
[अगर शौहर नफ़क़ा ही न दे तो?]
अब अगर ऐसी सूरत हो कि शौहर बीवी का जरूरी नफ़क़ा अदा नहीं करता, उसके पास खर्च देने की कुदरत है लेकिन जानबूझकर बीवी को खर्च नहीं देता, तो मामला ज्यादा संगीन हो जाता है
शौहर का यह फर्ज है कि वह बीवी का नफ़क़ा अदा करे। उसे यह हक नहीं कि वह बीवी को खर्च भी न दे और फिर उसके लिए हलाल तरीके से अपने जरूरी खर्च का इंतिज़ाम करने के रास्ते भी बंद कर दे कुछ हनफ़ी फतवों में ऐसी मजबूरी की सूरत में जब शौहर नफ़क़ा अदा नहीं करता और दूसरी मदद का कोई जरिया भी मौजूद नहीं, घर के अंदर काम करके जरूरत पूरी करने की गुंजाइश बयान की गई है; बाहर जाकर नौकरी करने का मसला फिर भी हालात और शरई शर्तों के मुताबिक देखा जाएगा इसलिए अगर किसी औरत का शौहर उसे खर्च नहीं देता तो वह खुद से कोई बड़ा फैसला करने के बजाय पहले शौहर को नसीहत करे, खानदान के समझदार लोगों को बीच में डाले और जरूरत पड़ने पर किसी मुस्तनद मुफ्ती से पूरी सूरत-ए-हाल बयान करके फतवा हासिल करे
[क्या बीवी अपने वालिदैन की मदद अपनी कमाई से कर सकती है? ]
अगर बीवी की अपनी जायज़ कमाई है तो वह अपने वालिदैन की मदद कर सकती है। एक हनफ़ी फतवे में भी बयान किया गया है कि बीवी अपनी कमाई की मालिक है और वह अपने वालिदैन को उसमें से दे सकती है लेकिन पति-पत्नी के बीच मोहब्बत और घरेलू निज़ाम को बरकरार रखने के लिए ऐसे मामलों में आपसी मशवरा और हिकमत से काम लेना बेहतर है शौहर को भी चाहिए कि सख्ती के बजाय हिकमत से काम ले यह बात भी समझना जरूरी है कि शौहर को शरीअत ने घर का जिम्मेदार बनाया है, लेकिन जिम्मेदारी का मतलब जुल्म या जबरदस्ती नहीं
[हदीस शरीफ में अल्लाह के रसूल ﷺ ने फरमाया]
[خَيْرُكُمْ خَيْرُكُمْ لِأَهْلِهِ]
📚 हवाला (Reference) :
[जामे तिर्मिज़ी]
इसलिए अगर बीवी का काम जायज़ है, उसमें शरई पाबंदियां पूरी हो रही हैं, घर के जरूरी हुकूक प्रभावित नहीं हो रहे और शौहर के पास भी कोई मजबूत वजह नहीं तो दोनों को आपस में बैठकर मसला हल करना चाहिए शौहर को केवल गुस्से या जिद की वजह से फैसला नहीं करना चाहिए और बीवी को भी अपनी मर्ज़ी को शौहर के हुकूक पर तरजीह नहीं देनी चाहिए नौकरी करने वाली बीवी के लिए जरूरी शरई पाबंदियां
अगर किसी सूरत में औरत को नौकरी करने की इजाज़त हो तो उसे इन बातों का खास ख्याल रखना चाहिए
1. नौकरी खुद जायज़ हो।
2. लिबास और पर्दे का पूरा एहतिमाम हो।
3. गैर-महरम मर्दों के साथ नाजायज़ मेल-जोल से बचा जाए।
4. तन्हाई और दूसरे नाजायज़ उमूर से बचा जाए।
5. नमाज़ और दूसरे फराइज़ में कोताही न हो।
6. शौहर और बच्चों के जरूरी हुकूक पामाल न हों
7. नौकरी की वजह से कोई हराम काम लाज़िम न आता हो
8 आने-जाने के रास्ते और सफर में भी शरीअत की पाबंदी की जाए
इन शरई पाबंदियों की तरफ फिक़्ही जवाबों में भी तवज्जोह दिलाई गई है
[खुलासा यह है कि]
फिक़्ह-ए-हनफ़ी के मुताबिक आम हालात में शौहर को यह हक हासिल है कि वह अपनी बीवी को ऐसी बाहरी नौकरी से रोक सके जिससे उसके शौहर के हुकूक या घर के निज़ाम पर असर पड़ता हो। अगर शौहर बीवी का नफ़क़ा अदा कर रहा है और नौकरी के लिए बाहर निकलने की जरूरत है, तो बीवी का उसकी इजाज़त के बगैर नौकरी करना दुरुस्त नहीं
लेकिन अगर निकाह के समय नौकरी जारी रखने की कोई जायज़ शर्त तय की गई थी तो उस शर्त का अलग हुक्म होगा इसी तरह अगर शौहर बीवी का जरूरी नफ़क़ा अदा नहीं करता और बीवी के पास अपनी जरूरत पूरी करने का कोई दूसरा जरिया नहीं तो मजबूरी की सूरत में हुक्म अलग हो सकता है और ऐसे मामले में पूरी कैफियत देखकर मुफ्ती से फतवा लेना जरूरी है
बीवी की जायज़ कमाई उसकी अपनी मिल्कियत है और शौहर को उस पर जबरन कब्जे का हक नहीं
इसलिए शौहर और बीवी दोनों को चाहिए कि वह एक दूसरे के हुकूक पहचानें जिद और गुस्से से बचें और किसी भी घरेलू मसले को लड़ाई और तलाक तक पहुंचाने के बजाय बातचीत मशवरे और शरीअत की रहनुमाई से हल करें
❖ वल्लाहो आलम बिस्सवाब ❖
