निकाह के वक़्त मेहर तय न किया गया हो तो निकाह और मेहर का क्या हुक्म है?
सवाल: ज़ैद ने हिंदह से निकाह किया। निकाह के वक़्त मेहर की कोई ख़ास मिक़दार मुक़र्रर नहीं की गई। न निकाहनामा में मेहर की रक़म लिखी गई और न ही निकाह की मजलिस में मेहर की कोई मिक़दार तय की गई। निकाह के बाद लड़की के घर वालों ने कहा कि जब मेहर पहले से तय नहीं हुआ तो शायद अब मेहर वाजिब नहीं होगा
सवाल यह है कि क्या मेहर तय किए बग़ैर निकाह सही हो जाता है? अगर निकाह सही है तो बीवी का मेहर कितना होगा? क्या शोहर अपनी मर्ज़ी से कोई भी रक़म बतौर मेहर दे सकता है? और अगर निकाह के बाद रुख़्सती या हमबिस्तरी से पहले तलाक़ हो जाए तो उस सूरत में कितना मेहर वाजिब होगा?
साइल मोहम्मद दानिश रजा़ कौशांबी उत्तर प्रदेश
अल-जवाब बि-औनिल-मलिकिल-वह्हाब
सूरत-ए-मसऊला में अगर निकाह की बाक़ी तमाम शरई शराइत मौजूद थीं और सिर्फ़ मेहर की मिक़दार निकाह के वक़्त मुक़र्रर नहीं की गई, तो निकाह फ़ासिद या बातिल नहीं होगा, बल्कि निकाह सहीह होगा हाँ, बीवी का मेहर ज़ाए नहीं होगा, बल्कि ऐसी सूरत में शरीअत के मुताबिक़ उसके लिए मेहर-ए-मिस्ल का हुक्म आएगा यानी मेहर की मिक़दार पहले तय न होने की वजह से बीवी मेहर से महरूम नहीं होगी
अल्लाह तआला ने क़ुरआन-ए-करीम में इरशाद फ़रमाया:
لَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ إِنْ طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ مَا لَمْ تَمَسُّوهُنَّ أَوْ تَفْرِضُوا لَهُنَّ فَرِيضَةً
तुम पर कोई गुनाह नहीं अगर तुम औरतों को तलाक़ दे दो, इससे पहले कि तुमने उन्हें हाथ लगाया हो या उनके लिए मेहर मुक़र्रर किया हो (सूरह अल-बक़रह: 236)
इस आयत से मालूम हुआ कि ऐसी सूरत हो सकती है जिसमें निकाह के वक़्त मेहर की मिक़दार मुक़र्रर न हुई हो। इसलिए सिर्फ़ मेहर की मिक़दार तय न होने की वजह से निकाह बातिल नहीं होता
मेहर क्या है?
मेहर वह माल या रक़म है जो निकाह के सबब शरीअत ने बीवी का हक़ मुक़र्रर फ़रमाया है यह शोहर की तरफ़ से बीवी पर कोई एहसान नहीं, बल्कि बीवी का शरई हक़ है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है
وَآتُوا النِّسَاءَ صَدُقَاتِهِنَّ نِحْلَةً
और औरतों को उनके मेहर ख़ुशदिली से अदा करो (सूरह अन-निसा: 4) इसलिए निकाह के बाद बीवी का मेहर शोहर के ज़िम्मे हक़ बन जाता है
क्या मेहर का निकाह के वक़्त तय होना ज़रूरी है?
मेहर का निकाह के वक़्त तय होना ज़रूरी नहीं कि हर सूरत में निकाह की सेहत उसी पर मबनी हो अगर किसी ने मेहर की मिक़दार बताए बग़ैर निकाह कर लिया तो निकाह सहीह हो सकता है लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि बीवी का मेहर ख़त्म हो गया ऐसी सूरत में बाद में शरीअत के मुताबिक़ मेहर तय किया जाएगा और जहाँ मेहर-ए-मिस्ल का हुक्म आएगा वहाँ उसी के मुताबिक़ बीवी का हक़ अदा किया जाएगा
मेहर-ए-मिस्ल क्या है?
मेहर-ए-मिस्ल से मुराद वह मेहर है जो उस औरत जैसी औरतों का आम तौर पर मुक़र्रर किया जाता है इसका अंदाज़ा लगाते वक़्त उसके खानदान की औरतों, जैसे उसकी बहन, फूफी, चचेरी या दूसरी क़रीबी रिश्तेदार औरतों के मेहर को देखा जा सकता है, बशर्ते उनकी हालत और सामाजिक व पारिवारिक हैसियत में मुनासिब समानता हो सिर्फ़ यह नहीं देखा जाएगा कि “लड़की के वालिदैन जितना चाहें उतना मेहर बता दें बल्कि फ़िक़्ही उसूलों के मुताबिक़ मेहर-ए-मिस्ल का एतिबार किया जाएगा हनफ़ी फ़िक़्ह की किताबों में मेहर-ए-मिस्ल की तफ़सील बयान की गई है अल-हिदाया बदाएउस्सनाए और रद्दुल-मुहतार में इस मसले की बहस मौजूद है
अगर निकाह के बाद दोनों ने मिलकर मेहर तय कर लिया तो?
अगर निकाह के वक़्त मेहर तय नहीं हुआ था, फिर निकाह के बाद शोहर और बीवी दोनों आपसी रज़ामंदी से कोई मिक़दार बतौर मेहर मुक़र्रर कर लें, तो अगर यह मुआमला शरई तौर पर सही तरीक़े से तय हुआ हो तो मेहर की वही मिक़दार मानी जा सकती है
मसलन निकाह के वक़्त कोई मेहर तय नहीं हुआ
एक महीने बाद शोहर ने बीवी से कहा मैं तुम्हारा मेहर एक लाख रुपये मुक़र्रर करता हूँ बीवी ने उसे क़ुबूल कर लिया तो इस तरह बाद में मेहर तय करने की सूरत पैदा हो सकती है लेकिन किसी भी सूरत में बीवी की रज़ामंदी के बग़ैर उस पर कोई कम रक़म थोपना दुरुस्त नहीं अगर शोहर कहे कि मेहर तो तय ही नहीं हुआ था, इसलिए मैं कुछ नहीं दूँगा? यह बात बिल्कुल दुरुस्त नहीं मेहर की मिक़दार पहले तय न होने से मेहर का हक़ ख़त्म नहीं होता अगर ऐसी सूरत में मेहर-ए-मिस्ल वाजिब हो चुका है तो शोहर के ज़िम्मे उसे अदा करना होगा बीवी का मेहर उसके शरई हक़ में से है और शोहर के लिए बिना उसकी रज़ामंदी के उसे ख़त्म कर देना जायज़ नहीं
रुख़्सती से पहले तलाक़ हो जाए तो क्या होगा?
यहाँ बहुत अहम तफ़सील है अगर निकाह के बाद मेहर तय नहीं हुआ और रुख़्सती/हमबिस्तरी से पहले तलाक़ हो गया तो इस सूरत में मेहर-ए-मिस्ल का पूरा हक़ नहीं होगा।
क़ुरआन-ए-करीम में इरशाद है:
وَإِنْ طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِنْ قَبْلِ أَنْ تَمَسُّوهُنَّ وَقَدْ فَرَضْتُمْ لَهُنَّ فَرِيضَةً فَنِصْفُ مَا فَرَضْتُمْ
और अगर तुम उन्हें हाथ लगाने से पहले तलाक़ दे दो और तुमने उनके लिए मेहर मुक़र्रर कर दिया था, तो जो मेहर मुक़र्रर किया था उसका आधा है (सूरह अल-बक़रह: 237)
लेकिन अगर मेहर तय ही नहीं हुआ था और हमबिस्तरी से पहले तलाक़ हो गई, तो क़ुरआन-ए-करीम ने ऐसी सूरत में मुतअह देने का हुक्म बयान फ़रमाया है अल्लाह तआला फ़रमाता है:
وَمَتِّعُوهُنَّ عَلَى الْمُوسِعِ قَدَرُهُ وَعَلَى الْمُقْتِرِ قَدَرُهُ مَتَاعًا بِالْمَعْرُوفِ
और उन्हें कुछ सामान/फ़ायदा देकर रुख़्सत करो; मालदार अपनी हैसियत के मुताबिक़ और तंगदस्त अपनी हैसियत के मुताबिक़ (सूरह अल-बक़रह: 236) इसलिए इस सूरत में मेहर-ए-मिस्ल की जगह मुतअह का हुक्म आएगा
अगर मेहर तय था लेकिन हमबिस्तरी से पहले तलाक़ हुई?
अगर निकाह के वक़्त मेहर मुक़र्रर किया गया था और हमबिस्तरी से पहले तलाक़ हो गई तो आधा मुक़र्रर मेहर वाजिब होगा मसलन मेहर 1 लाख रुपये तय हुआ था रुख़्सती और हमबिस्तरी से पहले शोहर ने तलाक़ दे दी तो अस्ल हुक्म के मुताबिक़ 50,000 रुपये मेहर देना होगा हाँ, अगर बीवी अपनी ख़ुशी से अपना हक़ माफ़ कर दे तो वह अलग बात है
अगर हमबिस्तरी हो चुकी हो तो?
अगर मेहर तय नहीं हुआ था और निकाह के बाद पति-पत्नी में हमबिस्तरी हो गई तो अब बीवी के लिए मेहर-ए-मिस्ल का हक़ पैदा होगा यानी सिर्फ़ यह कहकर कि मेहर तो निकाह के वक़्त तय नहीं हुआ था शौहर मेहर से बच नहीं सकता हमबिस्तरी के बाद मेहर-ए-मिस्ल के हुक्म की तफ़सील फ़िक़्ही किताबों में मौजूद है
क्या मेहर सिर्फ़ पैसा ही होना चाहिए? मेहर सिर्फ़ नक़द रुपये तक महदूद नहीं
शरीअत में ऐसी चीज़ जो मालियत रखती हो और शरीअत के मुताबिक़ मेहर बन सकती हो, उसे मेहर बनाया जा सकता है लेकिन मेहर की ऐसी चीज़ तय की जानी चाहिए जिससे बाद में झगड़ा न हो मसलन अगर कहा जाए तुम्हारा मेहर कुछ भी होगा जो मैं बाद में दूँगा तो यह वाज़ेह नहीं मेहर की मिक़दार या उसकी ऐसी चीज़ जिसे मेहर बनाया गया है, वाज़ेह होना बेहतर और मुनासिब है
मेहर मुअज्जल और मेहर मुतलक़ मेहर की दो मशहूर सूरतें हैं:
मेहर-ए-मुअज्जल: जो फ़ौरन या मुतालबा करने पर अदा किया जाता है मेहर-ए-मुतलक़: जिसकी अदायगी बाद के लिए मुक़र्रर की जाती है अगर निकाह के वक़्त यह तय किया जाए कि मेहर बाद में दिया जाएगा तो उसकी अदायगी का वक़्त और शराइत वाज़ेह करना चाहिए, ताकि बाद में झगड़ा पैदा न हो और अगर मेहर बीवी के ज़िम्मे बाक़ी है तो वह शोहर के ज़िम्मे क़र्ज़ की तरह रहेगा
क्या मेहर माफ़ करवाया जा सकता है?
अगर बीवी बालिग़, आक़िला और अपनी ख़ुशी से अपना मेहर माफ़ कर दे तो उसके लिए इसकी गुंजाइश है लेकिन घर वालों के दबाव, ज़बरदस्ती या धोखे से मेहर माफ़ करवाना दुरुस्त नहीं
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
فَإِنْ طِبْنَ لَكُمْ عَنْ شَيْءٍ مِنْهُ نَفْسًا فَكُلُوهُ هَنِيئًا مَرِيئًا
“फिर अगर वे अपनी ख़ुशी से उसमें से कुछ तुम्हें दे दें तो उसे ख़ुशगवारी से खाओ (सूरह अन-निसा: 4)
इससे मालूम हुआ कि बीवी की ख़ुशी और रज़ामंदी अस्ल है
मेहर को सिर्फ़ रस्म न समझें
आजकल कुछ जगहों पर मेहर को सिर्फ़ निकाहनामा में लिखी जाने वाली एक रक़म समझ लिया जाता है कई बार बहुत बड़ी रक़म लिख दी जाती है लेकिन शोहर का उसे अदा करने का कोई इरादा नहीं होता और कहीं बहुत कम मेहर लिखकर बाद में बीवी के हक़ को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है दोनों तरीक़े दुरुस्त नहीं मेहर बीवी का शरई हक़ है। इसलिए निकाह करने वालों को चाहिए कि अपनी हैसियत और मुनासिब हालत के मुताबिक़ ऐसा मेहर मुक़र्रर करें जिसे अदा करना उनके लिए मुमकिन हो और जिसे लेकर बाद में झगड़ा पैदा न हो
ख़ुलासा-ए-मसअला
अगर निकाह के वक़्त मेहर की मिक़दार मुक़र्रर नहीं की गई तो निकाह सहीह हो जाता है, बशर्ते निकाह की दूसरी तमाम शरई शराइत मौजूद हों मेहर का हक़ ख़त्म नहीं होता।
अगर बाद में मेहर तय कर लिया गया तो तयशुदा मेहर का एतिबार होगा और अगर मेहर तय न किया गया तथा हमबिस्तरी हो गई तो मेहर-ए-मिस्ल का हक़ होगा अगर मेहर तय नहीं हुआ था और हमबिस्तरी से पहले तलाक़ हो गई तो मेहर-ए-मिस्ल के बजाय मुतअह का हुक्म होगा और अगर मेहर पहले से मुक़र्रर था और हमबिस्तरी से पहले तलाक़ हुई तो आधा मुक़र्रर मेहर वाजिब होगा बीवी का मेहर उसका शरई हक़ है और शोहर के लिए उसकी रज़ामंदी के बग़ैर उसे ख़त्म करना जायज़ नहीं।
हवाला जात क़ुरआन-ए-करीम: सूरह अन-निसा, आयत 4 - क़ुरआन-ए-करीम: सूरह अल-बक़रह, आयात 236–237 - अल-हिदाया, किताबुन्निकाह, बाबुल-महर - बदाएउस्सनाए, जिल्द 2, किताबुन्निकाह، बहस-ए-महर - रद्दुल-मुहतार, किताबुन्निकाह، बहस-ए-महर - अल-फ़तावा अल-हिंदिय्या, किताबुन्निकाह، बाबुल-महर।
वल्लाहु तआला आलमु बिस्सवाब
कत्बा अल अब्द नाचीज़ मोहम्मद शफीक़ रजा़ रज़वी खतीब व इमाम सुन्नी मस्जिद हजरत मन्सूर शाह रहमातुल्ला अलैहि बस स्टैंड किशनपुर जिला फतेहपुर उत्तर प्रदेश
